अष्टावक्र और राजा जनक की कहानी रामायण से एक बहुत ही रोमांचक लेकिन अनजान घटना है। एक युवा लड़का अष्टावक्र ने राजा जनक के दरबार में राज्य के सबसे विद्वान ऋषियों से बहस करने के लिए गया, लेकिन उसके विकृत शरीर के लिए दरबारियों ने उसका उपहास किया। अष्टावक्र ने उन सबको अपने ज्ञान और बुद्धि से चुप करा दिया और राजा जनक को उनका शिष्य बना लिया।
एक दिन, जब अष्टावक्र और राजा जनक एक बाग में घूम रहे थे, तो अष्टावक्र ने राजा से पूछा, "आपको लगता है कि आप एक राजा हैं या एक ज्ञानी?" राजा ने कहा, "मुझे लगता है कि मैं दोनों हूँ।" अष्टावक्र ने कहा, "यह संभव नहीं है। आप या तो एक राजा हैं या एक ज्ञानी। आप दोनों नहीं हो सकते।"
राजा ने पूछा, "ऐसा क्यों?" अष्टावक्र ने कहा, "क्योंकि राजा और ज्ञानी के बीच एक बड़ा अंतर है। राजा वह है जो इस संसार को सच मानता है और उसके लिए लड़ता है। ज्ञानी वह है जो इस संसार को मिथ्या मानता है और उससे मुक्त होता है। राजा वह है जो अपने आसक्तियों का दास है। ज्ञानी वह है जो अपने आत्मस्वरूप का स्वामी है। राजा वह है जो अपने कर्मों के फलों के लिए चिंतित है। ज्ञानी वह है जो अपने कर्मों को फलों के बिना करता है।"
राजा ने कहा, "मुझे आपकी बात समझ में नहीं आ रही है। कृपया मुझे एक उदाहरण देकर समझाएं।" अष्टावक्र ने कहा, "ठीक है, मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ। आपने कभी सपना देखा है?" राजा ने कहा, "हां, मुझे कभी-कभी सपने आते हैं।" अष्टावक्र ने कहा, "आपको कैसे पता चलता है कि वह सपना था?" राजा ने कहा, "जब मैं जागता हूँ, तो मुझे पता चलता है कि वह सपना था।" अष्टावक्र ने कहा, "जब आप सपना देख रहे होते हैं, तो क्या आपको लगता है कि वह सच है?" राजा ने कहा, "हां, जब मैं सपना देख रहा होता हूँ, तो मुझे लगता है कि वह सच है।"
अष्टावक्र ने कहा, "यही आपका भ्रम है। आप जो अभी देख रहे हैं, वह भी एक सपना है।
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